India-china Border Dispute : Kumaon Regiment 120 Soldier Fight With China Army 1300 In 1962 War – जब शैतान सिंह के सामने भीगी बिल्ली बना था ड्रैगन, कुमाऊं रेजीमेंट के 120 जवानों ने 1300 चीनी सैनिकों को सिखाया था सबक 

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नवीन भट्ट, अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा)
Updated Fri, 04 Sep 2020 01:30 AM IST

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चीन की सेना आए दिन लद्दाख में एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) का उल्लंघन करने का प्रयास करती रहती है, पर भारत के साथ सीधे युद्ध करने की हिम्मत उसमें दिखाई नहीं पड़ती है। इसके पीछे 1962 में भारतीय जवानों का पराक्रम है जो चीन को आज भी याद है।भारत- चीन सीमा विवाद : लिपुलेख से 12 किमी दूर पाला मैदान में सैन्य बेस बनाने की तैयारी में चीनउस युद्ध में लद्दाख के चुशूल सेक्टर में 13 कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर शैतान सिंह ने 120 सैनिकों के साथ चीन के लगभग डेढ़ हजार सैनिकों से लोहा लिया और अपने प्राणों की आहुति देकर लद्दाख को चीन के कब्जे में जाने से बचा लिया था। यह तब हुआ जब भारत के पास अत्याधुनिक तकनीक और हथियार नहीं थे। पर आज स्थिति अलग है भारतीय सेना अत्याधुनिक हथियारों से लैस है।  भारतीय सैन्य अधिकारी बताते हैं कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह चार्ली कंपनी के कमांडर थे। साढ़े 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चुशूल सेक्टर (रेजांग्ला दर्रे) में कंपनी तैनात थी।

18 नवंबर 1962 की रात बर्फबारी हो रही थी। इसी बीच चीन ने लद्दाख के रेजांग्ला में हमला कर दिया। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में अहीर जवानों ने गोला, बारूद के अभाव के बावजूद सैकड़ों चीनी जवानों को मार गिराया। चीनी सेना ने ताबड़तोड़ हमले किए, लेकिन भारतीय जांबाजों ने इलाके को नहीं छोड़ा। वीरता के लिए मरणोपरांत मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र से नवाजा गया। रक्षा विशेषज्ञ अवकाश प्राप्त ले. जनरल मोहन चंद्र भंडारी ने बताया कि जब भारतीय सैनिकों के पास गोला-बारूद खत्म हो गया तो जवानों ने ग्रेनेड निकाले और चीनियों पर टूट पड़े। हालांकि इस युद्ध में चार्ली कंपनी के 114 जांबाज शहीद हो गए, छह सैनिकों को चीन ने बंदी बना लिया, लेकिन तब तक सैनिक अपना काम कर चुके थे। उन्होंने 1300 से अधिक चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था।उन्होंने बताया कि 13 कुमाऊं के जितने भी जांबाज शहीद हुए उनकी याद में आज भी चुशूल सेक्टर में बड़ा स्मारक है। 13 कुमाऊं रेजीमेंट रानीखेत में भी तैनात रही, उन्हीं की याद में यहां रेजांग्ला मैदान का निर्माण भी हुआ।गोलियां लगीं, मगर नहीं छोड़ा मैदानचीनी सेना से मुकाबला करते हुए मेजर शैतान सिंह को गोलियां लगीं, लेकिन वह अपनी पोस्ट पर साथियों के साथ डटे रहे और उनका हौसला बढ़ाते रहे। घायल अवस्था में चीनी सैनिकों से मोर्चा लेते हुए मेजर शैतान सिंह शहीद हो गए। दो माह बाद चुशूल सेक्टर में भारी बर्फ में दबे जांबाजों के शव बरामद हुए, जवानों की अंगुली बंदूकों की ट्रिगर पर थी और कई जवानों ने हथगोले हाथों में पकड़े थे।

सार
उस समय हिम्मत से जीता था मोर्चा, अब भारतीय सेना के पास हिम्मत के साथ अत्याधुनिक हथियार भी मौजूद 

विस्तार
चीन की सेना आए दिन लद्दाख में एलएसी (वास्तविक नियंत्रण रेखा) का उल्लंघन करने का प्रयास करती रहती है, पर भारत के साथ सीधे युद्ध करने की हिम्मत उसमें दिखाई नहीं पड़ती है। इसके पीछे 1962 में भारतीय जवानों का पराक्रम है जो चीन को आज भी याद है।

भारत- चीन सीमा विवाद : लिपुलेख से 12 किमी दूर पाला मैदान में सैन्य बेस बनाने की तैयारी में चीन

उस युद्ध में लद्दाख के चुशूल सेक्टर में 13 कुमाऊं रेजीमेंट के मेजर शैतान सिंह ने 120 सैनिकों के साथ चीन के लगभग डेढ़ हजार सैनिकों से लोहा लिया और अपने प्राणों की आहुति देकर लद्दाख को चीन के कब्जे में जाने से बचा लिया था। यह तब हुआ जब भारत के पास अत्याधुनिक तकनीक और हथियार नहीं थे। पर आज स्थिति अलग है भारतीय सेना अत्याधुनिक हथियारों से लैस है।  

भारतीय सैन्य अधिकारी बताते हैं कि 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान मेजर शैतान सिंह चार्ली कंपनी के कमांडर थे। साढ़े 14 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित चुशूल सेक्टर (रेजांग्ला दर्रे) में कंपनी तैनात थी।

जवानों ने गोला, बारूद के अभाव के बावजूद सैकड़ों चीनी जवानों को मार गिराया

18 नवंबर 1962 की रात बर्फबारी हो रही थी। इसी बीच चीन ने लद्दाख के रेजांग्ला में हमला कर दिया। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में अहीर जवानों ने गोला, बारूद के अभाव के बावजूद सैकड़ों चीनी जवानों को मार गिराया। चीनी सेना ने ताबड़तोड़ हमले किए, लेकिन भारतीय जांबाजों ने इलाके को नहीं छोड़ा। वीरता के लिए मरणोपरांत मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र से नवाजा गया। रक्षा विशेषज्ञ अवकाश प्राप्त ले. जनरल मोहन चंद्र भंडारी ने बताया कि जब भारतीय सैनिकों के पास गोला-बारूद खत्म हो गया तो जवानों ने ग्रेनेड निकाले और चीनियों पर टूट पड़े। हालांकि इस युद्ध में चार्ली कंपनी के 114 जांबाज शहीद हो गए, छह सैनिकों को चीन ने बंदी बना लिया, लेकिन तब तक सैनिक अपना काम कर चुके थे। उन्होंने 1300 से अधिक चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था।उन्होंने बताया कि 13 कुमाऊं के जितने भी जांबाज शहीद हुए उनकी याद में आज भी चुशूल सेक्टर में बड़ा स्मारक है। 13 कुमाऊं रेजीमेंट रानीखेत में भी तैनात रही, उन्हीं की याद में यहां रेजांग्ला मैदान का निर्माण भी हुआ।गोलियां लगीं, मगर नहीं छोड़ा मैदानचीनी सेना से मुकाबला करते हुए मेजर शैतान सिंह को गोलियां लगीं, लेकिन वह अपनी पोस्ट पर साथियों के साथ डटे रहे और उनका हौसला बढ़ाते रहे। घायल अवस्था में चीनी सैनिकों से मोर्चा लेते हुए मेजर शैतान सिंह शहीद हो गए। दो माह बाद चुशूल सेक्टर में भारी बर्फ में दबे जांबाजों के शव बरामद हुए, जवानों की अंगुली बंदूकों की ट्रिगर पर थी और कई जवानों ने हथगोले हाथों में पकड़े थे।

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जवानों ने गोला, बारूद के अभाव के बावजूद सैकड़ों चीनी जवानों को मार गिराया



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